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| AI द्वारा निर्मित चित्र |
05 अगस्त को BEO पिथौरा ने भेजा था प्रस्ताव, 30 सितंबर को DEO ने किया प्रधानपाठक को निलंबित; आदेश मीडिया तक पहुंचने में भी कई दिन लगे
पिथौरा/महासमुंद।
शासकीय प्राथमिक शाला खैरखुंटा के प्रधानपाठक नारद बरिहा के निलंबन को लेकर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद द्वारा जारी निलंबन आदेश के अनुसार, प्रधानपाठक के विरुद्ध 05 अगस्त 2026 को ही विकासखंड शिक्षा अधिकारी पिथौरा की ओर से निलंबन प्रस्ताव जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को भेजा जा चुका था।
दस्तावेज में उल्लेख है कि प्रधानपाठक 05 फरवरी 2026 से बिना किसी सूचना के अनुपस्थित थे। इसी आधार पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के नियम-3 के उल्लंघन का उल्लेख करते हुए निलंबन की कार्रवाई की गई।
बताया जा रहा है कि प्रधानपाठक करीब एक वर्ष से विद्यालय में अनुपस्थित थे। इस संबंध में ग्रामीणों की ओर से शिकायत किए जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि उपलब्ध निलंबन आदेश में अनुपस्थिति की अवधि 05 फरवरी 2026 से दर्ज है।
“करीब 8 महीने की अनुपस्थिति के बाद 30 सितंबर को निलंबन की कार्रवाई हुई।”
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 05 अगस्त को प्रस्ताव जिला कार्यालय पहुंचने के बावजूद निलंबन आदेश 30 सितंबर को ही क्यों जारी हुआ? प्रस्ताव और आदेश के बीच करीब 56 दिनों का अंतर है!
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| आदेश कपि |
29-30 सितंबर को मामला सार्वजनिक, 30 सितंबर को ही निलंबन आदेश
पूरे घटनाक्रम की टाइमलाइन भी अब चर्चा का विषय बन गई है। 29-30 सितंबर के आसपास प्रधानपाठक की लंबे समय से अनुपस्थिति का मामला सार्वजनिक हुआ और इस संबंध में खबर प्रसारित की गई। मामला स्थानीय स्तर पर चर्चित ‘जिला महासमुंद की खबरें’ WhatsApp ग्रुप में भी सामने आने के बाद शिक्षा विभाग की कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई।
इसके बाद 30 सितंबर को ही DEO महासमुंद द्वारा निलंबन आदेश जारी कर दिया गया।
हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि निलंबन खबर के दबाव में हुआ, क्योंकि निलंबन प्रस्ताव इससे करीब 56 दिन पहले, 05 अगस्त को ही भेजा जा चुका था।
लेकिन सवाल फिर भी कायम है कि जब प्रस्ताव 05 अगस्त को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहुंच चुका था, तो उस पर निर्णय लेने में करीब 56 दिन क्यों लगे?
आदेश 30 सितंबर का, मीडिया तक प्रति कई दिन बाद क्यों?
मामले में एक और सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा है। 30 सितंबर को निलंबन आदेश जारी होने के बावजूद इसकी प्रति पत्रकारों तक लगभग 5-6 दिन बाद पहुंचने की बात सामने आ रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि प्रशासनिक आदेश जारी होने के बाद उसकी जानकारी और प्रति मीडिया तक पहुंचने में इतनी देरी क्यों हुई?
अब विभाग से इन सवालों के जवाब अपेक्षित
- 05 अगस्त को प्राप्त निलंबन प्रस्ताव पर 30 सितंबर तक क्या कार्रवाई हुई?
- प्रस्ताव और निलंबन आदेश के बीच करीब 56 दिनों तक फाइल किस स्तर पर लंबित रही?
- 05 फरवरी से अनुपस्थित प्रधानपाठक के विरुद्ध फरवरी से अगस्त तक BEO स्तर पर क्या कार्रवाई की गई?
- 30 सितंबर को आदेश जारी होने के बाद इसकी प्रति मीडिया को तत्काल क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई?
- क्या 29-30 सितंबर को मामला सार्वजनिक होने और 30 सितंबर को निलंबन आदेश जारी होने के बीच कोई प्रशासनिक घटनाक्रम हुआ?
दस्तावेज यह स्पष्ट करता है कि निलंबन प्रस्ताव 05 अगस्त को ही जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय भेजा जा चुका था। इसलिए पूरे मामले में सवाल निलंबन की कार्रवाई से ज्यादा कार्रवाई में हुई देरी को लेकर है।
आखिर 05 अगस्त के प्रस्ताव पर 30 सितंबर तक निर्णय क्यों नहीं हुआ? यह सवाल अब शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक प्रक्रिया दोनों पर खड़ा हो रहा है।
सत्यवाहक न्यूज़:-की पड़ताल जारी है।


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