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93 मौतें, 90 को मुआवजा और 85 मामले बिलासपुर संभाग के—आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

 



बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में सर्पदंश मुआवजा प्रकरण को लेकर चल रही चर्चा के बीच अब लू से मौत के मामलों में राहत राशि के वितरण को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 से 20 जून 2025 तक प्रदेश में लू से मौत के 93 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 90 मामलों में राहत राशि का भुगतान किया गया, जबकि तीन प्रकरण लंबित बताए गए हैं।

90 मुआवजा प्रकरणों में 85 बिलासपुर संभाग से

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 90 मुआवजा प्रकरणों में से 85 मामले बिलासपुर संभाग से जुड़े बताए गए हैं। इस असामान्य आंकड़े को लेकर अब राहत राशि के वितरण और प्रकरणों के सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक वर्षवार आंकड़ों में 2021 में 4, वर्ष 2022 में 13, वर्ष 2023 में 29, वर्ष 2024 में 45 और 2025 में 20 जून तक 2 मौतें दर्ज की गईं।

विधानसभा में उठा मामला

बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने विधानसभा में इन आंकड़ों को लेकर सवाल उठाया और लू से मौत के मामलों में दिए गए मुआवजे की जांच की मांग की। वहीं कांग्रेस विधायक अटल श्रीवास्तव ने आरोपों को राजनीतिक नजरिए से देखने पर सवाल उठाया।

आंकड़ों से घोटाला साबित नहीं

हालांकि, केवल मौतों और मुआवजा प्रकरणों की संख्या के आधार पर किसी फर्जीवाड़े या घोटाले की पुष्टि नहीं की जा सकती। प्रत्येक मामले में मृत्यु का कारण, मेडिकल रिकॉर्ड, पंचनामा, मृत्यु प्रमाण-पत्र और मुआवजा स्वीकृति से संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।

बिलासपुर कलेक्टर की ओर से भी रिपोर्टों में कहा गया है कि यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

अब जांच पर नजर

सर्पदंश मुआवजा मामले में कथित अनियमितताओं की जांच के बाद सरकारी राहत राशि से जुड़े मामलों पर निगरानी बढ़ी है। ऐसे में लू से मौत के मुआवजा प्रकरणों की भी दस्तावेजी जांच की मांग उठ रही है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि 93 दर्ज मौतों में 90 मामलों में राहत राशि स्वीकृत होने और उनमें से 85 मामलों का बिलासपुर संभाग से होना किन परिस्थितियों का परिणाम है?

इसका स्पष्ट जवाब प्रत्येक प्रकरण की निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आएगा।

Satyavahak News | बिलासपुर

नोट: यह समाचार विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों और उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों पर आधारित है। किसी व्यक्ति, अधिकारी या विभाग को दोषी नहीं ठहराया जा रहा है। अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच के बाद ही सामने आएगा।

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